शुक्रवार, 2 मार्च 2012

गुनहगार




मिशल फ़र्नान्डिस सहमी और चिंता की निगाहों से अपने १२ बरस के बेटे ( ?) रोनी को चर्च की उतरती सीढ़ियों पर उछलते देख रही थी | पास बैठे रोनी के पिता जॉन ढलती शाम के साथ खामोश हो रहे आसमान की ओर मुंह उठाये , थके मन से कुछ सोच रहे थे | भाग्य से रूठे यादों ने बरसों पुरानी बातों को खुरेद कर रख दिया और फिर नापसंद घटनाओं की छवियाँ एक - एक कर सामने आने लगी |
१२ बरस पहले रोनी का जन्म लेना, मिशल का दुखभरी मातृत्व का निर्वाह करते रहना , जॉन और मिशल का हर कदम रोनी को किसी तीसरे से मिलने - जुलने को टालना ,
रोनी को दूर क़स्बे के स्कूल में भेजना , कुछ लोगों को पता चलने पर जॉन का अपने बैंक मेनेजर के पोस्ट से तबादला लेकर किसी दूसरे राज्य में आ बसना, हर कदम रोनी की निगरानी करना ... और बहुत कुछ ...|
रोनी के नपुसंक होने की समस्या आज भी उनके जीवन में पल और बढ़ रही है | दोनों किसी गुनहगार के तरह समाज में छिपे-छिपे रह रहें हैं, जी ( ? ) रहें हैं |


अवनीश तिवारी

०२-०२-२०१२

शुक्रवार, 11 मार्च 2011

पंडित और वेटर




अंकुर देर शाम अपनी पत्नी रमा और ४ साल की बेटी परी के साथ सैर करने निकले | लगभग २ घंटों के सैर से थकी , रमा ने रात का खाना ना बनाने और होटल में ही खाने की अपनी बात पर जोर दिया |

पत्नी के जिद का शिकार हुए अंकुर ने स्कूटर को पूजा होटल की राह पर मोड़ दिया |
होटल से २० कदम दूर ही स्कूटर खडी कर जब अंकुर आगे बढ़ा तो पास के मंदीर पर उसकी नजर पडी |

पत्नी से कहा , " चलो, आज सोमवार शिवालय में दर्शन कर लें | "
सपरिवार मंदिर में शिव पिंड के दर्शन कर, जब पंडित जी के पास पहुंचे तो पंडित ने सब के हाथों पर रक्षा की डोर बाँध , माथे तिलक लगा, आशीर्वाद के कुछ शब्द बुदबुदाये |
श्रद्धा ने सभ्यता को जगा दिया | विनम्रता से अंकुर ने ज्यों ५१ रूपये निकाल पंडित को देने बढे , कि रमा ने कोहनी से छूते हुए टोका, " ११ दीजिये, ५१ की क्या जरुरत है | "
रमा की लालच ने अंकुर की सभ्यता को जीत लिया और ११ रूपये ही पंडित को मिले |
होटल में खाने में कई लाजवाब डिश मंगाए गए | कुलाचा, पनीर - कढ़ाही, काश्मिरी पुलाव, पापड ... |
जब बिल की बारी आयी तो मानो ४५० रूपये का आंकड़ा खींस निपोरते अंकुर को चिढा रहा था |
शान सौकत के दबाव में जब अंकुर ने २५ रूपये निकाल वेटर को टिप्स देते हुए थेंक यू कहा, तो बेटी परी चिला उठी, " पापा, पापा, ११ दो , पंडित को भी इतना ही दिया ना "|
रमा ने परी के बांयें हाथ को पकड़ दबाया और आँखों के इशारे से अंकुर को २५ रूपये के साथ आगे बढ़ने की अनुमति दी |
होटल से निअकलते ही, पास के उस मंदिर के घंटे की आवाज से अंकुर का दिल फट सा गया और रमा मुंह में माउथ फ्रेशनर भरे स्कूटर पर बैठ गयी |

मंगलवार, 15 फरवरी 2011

२६ जनवरी और पेट [लघुकथा]

अभी अभी नेताजी २६ जनवरी के कार्यक्रम से घर लौट सोफे पर बैठे थे कि उनका ४ साल का बेटा उनकी गोद में कूद चढ़ा और हाथ में लिए तिरंगे को दिखा तुतराने लगा, "पापा पापा ये तिलंगा बाहल से खालिदा"| नेताजी की पैनी नज़रों ने तिरंगे के नीचे के उनकी पार्टी के चिन्ह को पहचान लिया |
गुस्से में तिरंगे को खींच अपने सेक्रेटरी को दिखा गुर्राते हुए नेताजी ने कहा, "देखो अभी नीचे इन तिरंगों को उन कमीने गरीबों में बांटा और सालों ने पेट भरने के खातिर इसे २ मिनट में बेच भी दिया| हरामी के बच्चे पेट के वास्ते देश के झंडे को भी नहीं छोड़ते|"
सेक्रेटरी ने शंका और प्रश्न से भरी नज़रों से नेता को देखा और नेताजी झेंप गए|
पीछे से बच्चा चिल्लाते हुए दौड़ गया - "झंडा उंचा रहे हमाला ... "|

अवनीश तिवारी

सोमवार, 13 सितम्बर 2010

रक्तदान - श्रद्धांजली

तकिये के नीचे रखा मोबाईल फोन कब से वाय्ब्रेसन की गुर गुर आवाज लागाये जा रहा था |
फोन के स्क्रीन पर सन्देश आ रहे थे - " कॉलिंग - अंकुर, कॉलिंग मामी, कॉलिंग - मधु "|
निशांत ने संदेशों की सूची देखी , संदेशों की कतार लगी थी - " हैप्पी बर्थडे - उमेश, जन्म दिन शुभकामनाएं - अवनीश, मेनी मेनी हैप्पी रिटर्न ऑफ़ द डे - भारती " और बहुत सारे |
निशांत इन सब से अछूता अपने किसी जरुरी काम में लगा हुया था |
बिस्तर पर लेटे लेटे एकाएक उसकी यादें १० बरस पीछे दौड़ पडी | बारीश की वो शाम, निशांत का एक अस्पताल से दूसरी को बेहताशा दौड़ना, लोगों को फोन कर मदद की गुहार लगाना और आखिर में हार कर उस अस्पताल पहुँच, रक्त ना मिलने से मरी पडी अपनी ५० बरस की माँ को देखना |
तब से अपने हर जन्मदिन पर निशांत रक्तदान कर, अपनी माँ को श्रद्धांजली देता है |
आज ११ वी बार है ...


अवनीश तिवारी

३०-०८-२०१०

शनिवार, 12 सितम्बर 2009

खराब नस्ल

उम्र के ५० वें साल में भी सोमेश शुक्ल को आधुनिकीकरण का मर्ज लग गया था | दरसल, नए शहर में हुए तबादले ने उनके जीवन पर शहरीकरण का गहरा असर कर छोडा था | उनके बोल - चाल , रहन - सहन, सोच - विचार सबसे बनावट की सुगंध आने लगी थी | शहरी जीवन ने उनकी अब तक की विद्वता को उसी तरह ढँक लिया था जैसे बरसों से बंद किसी कमरे की मेज को धुल ढँक ले | सोमेश बाबू का यह अग्रसर पतन उन्ही तक सीमित ना होकर पूरे परिवार तक पहुँच चुका था | सरपर सवार इस भूत के कारण अपनी २१ बरस की बेटी की शादी उन्होंने एक श्रीमंत के बेटे से करने की ठान रखी थी | लड़का पक्ष सोमेश बाबू के कुल से निम्न था और धन सम्पन्नता के सिवाय और कोई विशेष गुणी कुल नहीं था |

कृपाशंकर दुबे एक विद्वान पंडित थे और सोमेश बाबू के समकक्ष भी | ज्योतिष विद्या का अच्छा ज्ञान होने के से सोमेश बाबू ने उन्हें अपनी बेटी और पसंद किये लडके की कुण्डली मिलाकर निर्णय बताने का काम दे रखा था |
कुल और गुणों की असमानता की बात दुबेजी को खटक रही थी | वे अपने भटके मित्र को चाह कर भी नहीं समझा पा सके | कुंडलियों के साथ दुबेजी अपने मित्र के घर पहुंचे | दरवाजे से ही भीतर से एक कर्कश आवाज़ आ रही थी | सोमेशजी दरवाजे पर बंधी अपनी अल्सेशियन कुतिया को बेतहासा बेंत से पीट रहे थे | आस - पास का माहौल कुतिया के तीखे स्वर से गूंज रहा था | दुबेजी के भीतर की मानवता ने सोमेशजी का हाथ पकड़ लिया और उन्होंने कहा ," जानवर है रहने दीजिये " ? सोमेशजी ने आवेश में उत्तर दिया ," २-३ रोज से बाहर के आवारा कुत्तों के साथ रहती है , यदि खराब नस्ल के पिल्लै हो गए तो बड़ी दिक्कत हो जायेगी " | अपने बहके मित्र को समझाने का मौका मिलते ही पंडित जी बोल पड़े ," आपको कुतिया की नस्ल की फिकर है लेकिन अपनी बेटी के बारे में ? वह नस्ल खराब होने से क्या होगा इसके बारे में सोचिये " | अपने आदरणीय मित्र के कटु शब्दों ने सोमेशजी के ह्रदय को भेद दिया | वे अन्दर चले गए | कुछ देर बाद लौटकर उन्होंने पंडितजी से कुण्डली पत्रिकाएं ली और अपने बदले निर्णय की सूचना दी |



अवनीश तिवारी
१२-०९-२००९

बृहस्पतिवार, 14 मई 2009

वैधव्य

मित्रों,
पुनर्विवाह वैधव्य का एक उपाय है | आप क्या सोचते हैं ? पढिये ...

बिना मुहूर्त, बिना ताम - झाम और बिना किसी गाजे - बाजे के, देर शाम एक विवाह सम्पन्न हो रहा है | शम्भुनाथ तिवारी एक मध्यमवर्गीय शिक्षक हैं | अपने सदाचार से लोकप्रिय हैं पर इस विवाह ने उन्हें सबसे दूर कर दिया है | इतना की घर के सगे भाई, बहन और अन्य करीबी रिश्तेदारों ने तक उनसे मुंह मोड़ लिया है | सारे गाँव में इस विवाह की आलोचना की जा रही है और शम्भुनाथ किसी अपराधी की तरह इसे चुपके से अपने सभी रीति - रिवाजों के विरूद्व हो, किसी यज्ञ की भाँती संपन्न किये जा रहे हैं |

दुल्हन उनकी बहु है जो शादी के १ बरस बाद विधवा हो गयी थी और पिछले ३ बरसों से वैधव्य का भार वहन करे आ रही है | उसे शम्भुनाथ अपने ही पढाये एक योग्य नौजवान के साथ ब्याह रहें हैं |

दरवाजे पर अकेले खड़े शम्भुनाथ ने सजल नेत्रों से हाथ उठा दुल्हन को बिदाई दी और टैक्सी चल दी | पास के कमरे से झाँक रही है उनकी बेटी जो पिछले ५ बरसों से वैधव्य का अभिशाप लिए अपने पिता के घर जी (?) रही है |

१४-०५-२००९

शनिवार, 28 मार्च 2009

वह गरीब है ना...

मित्रों,
मुम्बई में एक शाम घटी एक छोटी सी घटना को एक लघुकथा के रूप में व्यक्त करने का प्रयास किया है |
कुछ समय दे कर पढिये |


वह गरीब है ना...

आज फ़िर दफ्तर के कामों में उलझे होने और बचे कामों को पूरा करने की तंग अवधि के कारण, दोपहर के खाने से दूर रहना पड़ा | सुबह का वह बैग शाम जाते समय भी उतना ही वजनदार था | काम पूरा हो जाने की खुशी पेट के भूख को भुला कर रह रह संतोष का पुट मष्तिष्क में छोड़ जा रही थी | यह संतोष मेरी चाल की तेजी में बदल मुझे अपने घर की ओर ले जा रही थी | एकाएक पास के चाट की दूकान पर नज़र पड़ी और भूक ने अपना मुंह उढा लिया | मन चाट का स्वाद लेने ललच पड़ा और मैं चाट की दूकान पर आ जमा | मै चाट के लिए कह कर खडा रहा | ४-६ जनों की मांग पहले से होने के कारण मेरा नंबर अभी नहीं आया था | इस बीच एक फटे हाल , कुछ अधिक उम्र का दुबला सा आदमी, पैरों के टूटते हुए चप्पलो को खींचते धीरे - धीरे बढ़ा आ रहा था | उसकी दीनता दूर से ही अपना परिचय दे रही थी | गहरे रंग के इस आदमी ने भी चाट के लिए कहा और मेरे समीप रूक मुंह लटका कर खड़ा हुआ | पास फेंकें गए चाट के जुठे पत्तलों को चाटने कई कुत्ते जमें थे | उनमें एक पिल्ला किसी ज्यादा भरे जुठे पत्तल को पा उसे तूफानी गति से चाटे जा रहा था | कोई दूसरा तंदुरुस्त कुत्ता उस पिल्लै को पत्तल चाटते देख उसकी तरफ़ झपटा और उसे काट भगाया | पिल्लै को पत्तल चाटने के लिए मिली इस सजा से हुए हल्ले से चौक और यह सब देख उस गरीब के ह्रदय की पीड़ा उसके मुंह तक आ गयी | वह कुत्ते की ओर अपने दाहिने हाथ की तर्जनी से निशाना लगा झुंझलाहट में बोल पड़ा - " ये उसे क्यों मारता है, वह गरीब है ना " | गरीबी की व्यथा से निकला यह दर्द सुन मैं सन्न सा रह गया | और लोग यह सब देख सुन उसे अनदेखा कर अपने अपने चाट में मस्त हो गए | दीनता की पुकार हर कोई नहीं समझ सकता | मै भी अपना चाट खा वहां से निकल पडा | वह क्षणिक घटना बार बार दीमाग में चोट करे जा रही थी, जिससे आहत मैं अब मंद गति से, किसी सोच में खो चला जा रहा था |



अवनीश तिवारी
२२-०३-२००९